Dec 19, 2012

कांच



कांच के टुकड़े
बिखरे है चारों तरफ
इतने चमकदार.... लुभावने ।
सब में अपना अक्स  सा कुछ दिखता है

जब भी कोई टुकड़ा उठाती हूँ
चुभ जाते है कुछ हाथों में
कुछ पैरों में
छलक आती है चंद बूँदें
गाढ़ी .. लाल ।


अरसा एक गुज़रता है फिर
कसक जाने में
भूल जाती हूँ अपना चेहरा
दर्द भी ... निशां भी ।

और फिर दौड़ पड़ती हूँ
उन्ही कांच के टुकड़ों की तरफ

अपना नया अक्स देखने ।


Dec 8, 2012

सर्दियाँ




दिसंबर की सुबह 
दिल्ली में रिक्शे का सफ़र 
4 सड़कों का 5 मिनट का रास्ता 
और फिर 
जब कुछ सर्द हवाएं 
एक कान के पास से आकर 
बालों की किसी लट को उडाती हुई 
आँखों के गुनगुने नमकीन से पानी को 
ठंडा बना कर 
दुसरे कान के पास से गुज़रती है 
तो लगता है......





कितनी सर्दी है यार :(
ऑफिस bunk कर देते है !!!! :P