Oct 23, 2012

दांव


आज-कल
कुछ ज्यादा नज़र आती है
मेरी गलतियाँ मुझको
सचेत;
आस पास मंडराती हुईं ..

हर वक़्त, हर बात पर मेरी
प्रतिक्रियाएं देखती हुई

मेरे हंसने का कारण
मेरी चुप की वजह,
मेरे चलने के रास्ते
मेरी थमने की जगह।

मेरे हर शब्द की परिभाषा
मेरी हर सोच का इतिहास,
मेरे हर एक कदम की चाल
मेरी हर इक नज़र का पास।

इतनी फिक्रमंद?
पहले तो कभी नहीं रहीं  ..

कुछ फैसला लिख रहीं  है शायद 
इस लम्बे खेल की हार-जीत का
काफी सबूत इकठ्ठे किये है 
जीतने की उम्मीद होगी उनको,

पर मेरा दांव* देखे बिना
ख़ुशी न मना लेना .. :)

हम दोनों का निर्देशक एक ही है
और पिक्चर अभी बाक़ी है। :)

the last lines are inspired by the filmy air around, Yash Chopra Ji,  I too had a few favorites among your type of flicks :) RIP!

* move in a game, stakes

Oct 19, 2012

parallel lines :-/

the fate of parallel lines

they go along all the way
synced, consistent, together
only to meet never

they can be close
but must follow different tracks
to qualify as themselves

they can fade away
but cant think of merging
lest they break the rule!


and here I see coming... SO WHAT ???!!! :P

... sometimes you just get these out of the blue thoughts when you are on an off from office, lie on bed, down with cold and not able to sleep due to this irritating running nose !!! :(


Oct 5, 2012

लोग



कोई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नहीं
आँख के शीशे मेरे चटके हुए है


टुकड़ों टुकड़ों में सभी लोग मिले है मुझको।


                      - गुलज़ार