Mar 27, 2012

परछाइयाँ

जिन दरवाजों पर सुबह-शाम दस्तक देते है लोग
उस घर में तो हम रहते ही नहीं
हाँ हमारी परछाई रहती थी कभी

और परछाइयों का क्या
आती-जाती रहतीं  हैं...

काश कोई हमारे घर तक पहुँचता
तो हमसे मुलाकात हो पाती ।



Mar 19, 2012

Irony

I wandered a whole long day
and a sleepless night,
for stars to be soother
and sun to be bright..

respectively  !!




Feb 4, 2012

कहानियां

कहानियों के गुच्छे
कुछ सुलझाने है तुम्हारे साथ
गर मिले कभी हम
फुर्सत से..

बताउंगी तुम्हे
क्यों वो कहानी
इतनी लम्बी थी
फिर.. एक छोटी सी;
क्यों उस वाली में
इतना रोयी थी
क्यों किसी और में
ज़रा खुश थी।
क्यों एक बार
शब्द नहीं दिए थे किरदारों को
क्यों अगली में फिर
जी भर कर बातें की थी
हाँ , एक कुछ फ़िल्मी थी
और एक कड़वा सच सी ...

बुरा लगेगा तुम्हे,
जानती हूँ
तुम्हारा ज़िक्र जो नहीं था
किसी कहानी में,
शायद तुम समझ पाओगे
तुम्हारे ही तो रूप लिए थे
सब  नायकों ने;

नायिका भी तो मैं ही थी
हर बार।

कुछ इसी तरह
ज़िन्दगी के तमाम पहलू
गुज़ारे है तुम्हारे साथ
तुम भी तो... थे ही नही,
मैं भी क्या करती?

Jan 21, 2012

मधुशाला

जितनी दिल की गहराई हो
उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो
उतनी मादक है हाला,

जितनी उर की भावुकता हो
उतना सुन्दर साक़ी है
जितना ही हो रसिक, उसे है
उतनी रसमय मधुशाला

मेरी हाला में सबने
पायी अपनी-अपनी हाला
मेरे प्याले ने सबने
पाया अपना-अपना प्याला,

मेरे साक़ी में सबने अपना
प्यारा साक़ी देखा,
जिसकी जैसी रूचि थी उसने,
वैसी देखी मधुशाला

       - बच्चन