Jan 9, 2015

तब, अब !



इस शहर की हवा का शोर
जो सांसों में घुल गया था
आज फिर अलग-अलग सुनाई दे रहा है
पहले चंद दिनों सी झिझक है
अजनबीपन है।
यहां survive ना कर पाने का
वो दर्द फिर महसूस हो रहा है
Streets & Avenues
फिर से designer लग रहे है।
ख़ुद में और बाकियों में
फिर से अन्तर दिख रहा है।




फिर बाहर का शहर और अन्दर की दुनिया
सामने बैठ कर बातें कर रहे है,

और मेरी इस किताब का
Prologue & Epilogue
discuss कर रहे हैं। :-)




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