May 15, 2015

खून


पत्थरों के डर से रुकना मत
फूल होते तब देते

राह रोकें तो डरना मत
हाथ होते तो साथ देते

नीचा दिखायेंगे पर झुकना मत
बड़े होते तो यूं ना गिरते

गलतियां थोपेंगे, बिखरना मत
सही होते गर खुद सच्चे होते

रस्मों-रिवाज़ों से दबायेंगे सहना मत
नियम मानते तो निष्पक्ष होते

तुम्हारी जि़न्दगी चलायेंगे सौंपना मत
यही हक़ होता तो फिर भगवान होते

साथ छोड़ देंगे तो गिरना मत
अपने होते तो हर दम होते।


तुम्हें दुख होगा
दर्द भी बहुत
पर जूझना.....
तुम टूट भी जाओ
तुम्हारा 'खून'* हारेगा नहीं।



*Lineage
For women who still face social evils

May 9, 2015

केलेंडर



केलेंडर तो
दिनों को जोड़ता है
पल रखे हों कुछ
तो कैसे जोडू -मिलाऊँ






तारीखें नहीं बचीं....
आजकल यूँ ही है 
इसे कैसे याद रखूं-दिलाऊँ

 फ्रेम नाज़ुक इक
इस कदर टूटा पिछले दिनों
क्या तस्वीर थी उसमें
अब कैसे देखूँ - बताऊँ


Jan 30, 2015

घर वापसी :-)

बाहर के मेरे कमरे की
सीलन वाली दीवार पर लगा
सानिया मिर्ज़ा का poster

संकरी बंद गली मे खुलती
आधे कांच की खिड़की

सामने की सड़क के मोड़ पर
बंधी किसी की गाय

और उसके आगे के घर में
एक छोटा beauty parlor

Scooty और शहर की सड़कें
uncle और आंटियों की नज़रें

भूले बिसरे लोग
जानी पहचानी भाषा



A lifetime
since the last time
I was here
Here I come! :-)


Jan 9, 2015

तब, अब !



इस शहर की हवा का शोर
जो सांसों में घुल गया था
आज फिर अलग-अलग सुनाई दे रहा है
पहले चंद दिनों सी झिझक है
अजनबीपन है।
यहां survive ना कर पाने का
वो दर्द फिर महसूस हो रहा है
Streets & Avenues
फिर से designer लग रहे है।
ख़ुद में और बाकियों में
फिर से अन्तर दिख रहा है।




फिर बाहर का शहर और अन्दर की दुनिया
सामने बैठ कर बातें कर रहे है,

और मेरी इस किताब का
Prologue & Epilogue
discuss कर रहे हैं। :-)